1948 में बंगाल में बैंकिंग संकट के बाद पहली
बार बैंक में रखी गयी जमाराशियों का बीमा कराने की संकल्पना पर विशेष ध्यान
दिया गया । 1949 में इस विषय पर पुनः विचार किया गया परंतु बैंकों का निरीक्षण
करने हेतु रिज़र्व बैंक द्वारा पर्याप्त व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने तक इसे
आस्थगित रखा गया । बाद में 1950 में ग्रामीण बैंकिंग जांच समिति ने भी इस संकल्पना
का समर्थन किया । तथापि, 1960 में पलाइ सेंट्रल बैंक लिमि. और लक्ष्मी बैंक
लिमि. के विफल हो जाने के बाद रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार द्वारा जमाराशियों
का बीमा करने के संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया गया । 21 अगस्त 1961 को
संसद में निक्षेप बीमा निगम (डीआइसी) बिल प्रस्तुत किया गया । संसद द्वारा
इसे पारित किये जाने के बाद 7 दिसंबर 1961 में इस बिल को राष्ट्रपति की सहमति
प्राप्त हुई और 1 जनवरी 1962 से निक्षेप बीमा अधिनियम, 1961 लागू हुआ ।
प्रारंभ में जमा बीमा स्कीम मात्र कार्यकारी वाणिज्य बैंकों तक ही लागू की
गयी । इसमें भारतीय स्टेट बैंक तथा इसके सहायक बैंक और अन्य वाणिज्य बैंक एवं
भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों की शाखाएं सम्मिलित थीं ।
निक्षेप बीमा निगम (संशोधन) अधिनियम, 1968 के अधिनियमन के बाद निगम से यह अपेक्षित
था कि वह अधिनियम की धारा 13ए के प्रावधानों के अंतर्गत ' पात्र सहकारी बैंकों
' को बीमाकृत बैंकों के रूप में पंजीकृत करें।ऐसे राज्य में जहां पात्र सहकारी
बैंक वह है (चाहे वह राज्य सहकारी बैंक हो या मध्यवर्ती सहकारी बैंक हो), निबीप्रगानि
अधिनियम, 1961 की अपेक्षानुसार अपने सहकारी समिति अधिनियम में इस आशय से संशोधित
करते हुए समर्थकारी कानून पारित किया है ¹ˆÅ राज्य सरकार रिज़र्व बैंक को यह
अधिकार दे सके कि राज्यों /संघ शासित क्षेत्रों की समितियों के रजिस्ट्रार
को वह यह आदेश दे सके कि किसी सहकारी बैंक का समापन कर दे अथवा इसके प्रबंध
समिति को अधिक्रमित करे और रजिस्ट्रार से अपेक्षित है कि वह रिज़र्व बैंक से
लिखित पूर्व स्वीकृति के बिना किसी सहकारी बैंक के समापन, समामेलन या पुनर्निमाण
के लिए कोई कार्रवाई न करें।
इसके अतिरिक्त भारत सरकर ने रिज़र्व बैंक के परामर्श से जुलाई 1960 में एक
ऋण गारंटी योजना तैयार की । भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 17(11ए)
(ए) के अंतर्गत केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में स्कीम का संचालन रिज़र्व
बैंक को सौपा गया तथा बैंकों और अन्य ऋण संस्थाओं द्वारा लघु उद्योगों को स्वीकृत
अग्रिमों को गारंटी प्रदान करने हेतु ऋण गारंटी संगठन (सीजीओ) के रूप में प्राधिकृत
किया गया । रिज़र्व बैंक ने 31 मार्च 1981 तक स्कीम का परिचालन किया।
रिज़र्व बैंक ने 14 जनवरी 1971 को भारतीय ऋण गारंटी निगम (सीजीआइसी) नामक
एक पब्लिक लिमि., कंपनी भी प्रारंभ किया । भारतीय ऋण गारंटी निगम लिमि.,
द्वारा प्रारंभ की गयी ऋण गारंटी स्कीमों का प्रधान उद्देश्य था प्राथमिकताप्राप्त
क्षेत्र के अंतर्गत शामिल लघु और जरूरतमंद उधारकर्ताओं को ऋण संस्थाओं द्वारा
स्वीकृत ऋणों और अग्रिमों को गारंटी सुरक्षा प्रदान कर, अब तक उपेक्षित क्षेत्रों
विशेषकर, उद्योगेतर क्रियाकलापों से संबध्द समाज के कमजोर वर्गें की ऋण आवश्यकताओं
को पूरा (प्रदान ) करने हेतु प्रोत्साहित करना । जमा बीमा और ऋण गारंटी के
कार्यों को समेकित करने के उद्देश्य से उपर्युक्त दोनों संगठनों (डीआइसी
और सीजीसीआइ) के विलय से 15 जुलाई 1978 के निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी
निगम अस्तित्व में आया । इसके परिणामस्वरूप जमा बीमा अधिनियम,1961 का नाम
बदलकर " निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 "
कर दिया गया।
1 अप्रैल 1981 से निगम ने भारत सरकार की ऋण गारंटी स्कीम के रद्द हो जाने
के बाद लघु उद्योगों को स्वीकृत ऋण को भी गारंटी प्रदान की। भार्तीय रिजर्व
बैंक की परिभाषा के अनुसार 1 अप्रैल, 1989 से समग्र प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र
को भी गारंटी सुरक्षा प्रदान की जाने लगी । दिनांक 1 अप्रैल, 1995 से सभी
आवास ऋणों को निगम की गारंटी सुरक्षा की परिधि से निकाल दिया गया ।