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विधि रूपरेखा संगठन और कार्यपद्धति |
संगठन और कार्यपद्धति
निगम का प्राधिकृत पूंजी 50 करोड़ है जो पूर्णत: भारतीय रिज़र्व बैंक (भारिबैं)द्वारा जारी और अभिदत्त है। निगम का प्रबंधन निदेशक बोर्ड के पास है जिसमें भारिबैं का उप गवर्नर अध्यक्ष है। निबीप्रगानि अधिनियम के अनुसार बोर्ड में अध्यक्ष के अलावा निम्न शामिल होने चाहिए- i) भारिबैं का एक अधिकारी(सामान्यत: कार्यपालक निदेशक के स्तर का) ii) केंद्र सरकारा का एक अधिकरी iii) भारिबैं के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा नामित पांच निदेशक जिनमें से तीन ऐसे जो वाणिज्य बैंकिंग, बीमा, वाणिज्य, उद्योग, वित्त की विशेष जानकार हों और दो सहकारी बैंकिंग या सहकारी आंदोलन की विशेष जानकार या अनुभवी हो और कोई भी केंद्र सरकार या भारिबैं के कर्मचारी या निगम या किसी बैंकिंग कंपनी या सहकारी बैंक के कर्मचारी हों अथवा अन्यथा किसी बैंकिंग कंपनी या सहकारी बैंक के साथ सक्रिय रूप से संबद्ध हो और iv) भारिबैं के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा नामित चार निदेशक जो लेखा, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, सहकारिता, अर्थ शास्त्र, वित्त, विधि या लषु उद्योग या कोई अन्य मामला जिसे निगम के लिए उपयोगी समझा जाए के जानकर हों। निगम का प्रधान कार्याल मुंबई में है। एक कार्यपालक निदेशक/मुख्य महाप्रबंधक इसके वरिष्ठ अधिकारियों के समग्र दैनंदिन कार्यों के लिए प्रभारी अधिकारी है। निगम की चार शाखाएं हैं कोलकाता, चेन्नई, नागपुर और नई दिल्ली। इनमें से कोलकाता, चेन्नई और नागपुर स्थित शाखाएं 30 नवंबर 2006 से बंद कर दी गयी है चूंकि लगभग सभी बैंकों ने ऋण गारंटी योजना से बाहर निकल गए और कई लंबित दावों का निपटान कर दिया गया। जबकि, इन तीनों शखाओं के प्रमुख कार्य मदों को निगम के मुख्य कार्यालय द्वारा किया जा रहा है कुछ अवशेष कार्य मद निबीप्रगानि के कक्ष के पास हैं जिन्हें विशेष रूप से भारत्यी रिज़र्व बैंक के ग्रामीण आयोजना और ऋण गारंटी निगम के संबंधित केंद्रों में स्थापित किया गया है।
ज़मा बीमा
ज़मा बीमा स्कीम में शामिल बैंक
(I) भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों की शाखाओं सहित सभी वाणिज्य बैंक स्थानीय क्षेत्र बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक जमा बीमा स्कीम के अंतर्गत शामिल हैं ।
(II)सहकारी बैंक - निबीप्रगानि की धारा 2 (जीजी) में यथापरिभाषित सभी पात्र सहकारी बैंकों को जमा बीमा योजना के द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है । राज्यों /संघ शासित क्षेत्रों में कार्य कर रहे सभी राज्य, मध्यवर्ती और प्राथमिक सहकारी बैंक जिन्होंने निबीप्रगानि अधिनियम, 1961 की अपेक्षानुसार रिज़र्व बैंक को यह अधिकार देने के लिए अपने सहकारी समिति अधिनियम को संशोधित किया है कि वह राज्यों /संघ शासित क्षेत्रों की समितियों के रजिस्ट्रार को आदेश दे सके कि किसी सहकारी बैंक का समापन कर दे अथवा इसके प्रबंध समिति को अधिक्रमित करे और रजिस्ट्रार से अपेक्षित है कि वह रिज़र्व बैंक से लिखित पूर्व स्वीकृति के बिना किसी सहकारी बैंक के समापन, समामेलन या पुनर्निमाण के लिए कोई कार्रवाई न करें, पात्र सहकारी बैंक समझे जाते हैं । वर्तमान में मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड और दादरा और नगर हवेली के संघ शासित क्षेत्रों के अलावा सभी सहकारी बैंक स्कीम में शामिल है । छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड के तीन नए राज्यों के सहकारी बैंकों जो इने राज्यों के निर्माण की तारीख तक बीमित हैं स्कीम के अंतर्गत जारी हैं जबकि उनके सहकारी समिति अधिनियम में समर्थकारी विधि प्रावधान अधिनियमित करने के सबंध में उनके साथ अनुवर्ती कार्रवाई की जारही है।
बीमित बैंकों के रूप में नए बैंकों का पंजीकरण
निबीप्रगानि अधिनियम, 1961 की धारा 11 के अंतर्गत सभी नये वाणिज्य बैंकों से अपेक्षित है कि बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 22 के अंतर्गत रिज़र्व बैंक द्वारा लाइसेंस जारी करने के तुरंत बाद निगम के साथ पंजीकरण कराएं । क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के अधिनियमन से सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से अपेक्षित है कि वे स्थापना की तारीख से 30 दिनें के अंदर निबीप्रगानि 1961 की धारा 11 ए के अनुसार पंजीकरण कराएं ।
सहकारी बैंक - एक नये सहकारी बैंक से अपेक्षित है कि वह रिज़र्व बैंक द्वारा लाइसेंस जारी करने के तुरंत बाद पंजीकरण कराएं ।
जब किसी प्राथामिक सहकारी बैंक की स्वाधिकृत निधियां 1 लाख रुपए हो जाते हैं तो उसे स्वयं ही प्राथमिक सहकारी बैंक के रूप में कारोबार करने हेतु रिज़र्व बैंक से आवेदन करना होगा और लाइसेंस के लिए आवेदन की गयी तारीख से 3 महीनों के अंदर निगम के साथ पंजीकरण कराना होगा ।
निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (संशोधन) अधिनियम ,1968 के लागू होने के बाद सहकारी बैंक के रुप में कारोबार कर रहे किसी अन्य सहकारी समिति के विभाजन अथवा बैंकिंग विधि (सहकारी समितियों पर प्रयोज्य) अधिनियम, 1965 के प्रारंभ के समय से या इसके बाद से बैंकिंग कारोबार करनेवाले दो या अधिक सहकारी समितियों के समामेलन से अस्तित्व में आए सहकारी बैंक को लाइसेंस के लिए आवेदन की गयी तारीख से तीन महीनों के अंदर पंजीकरण कराना है । तथापि, ऐसे किसी सहकारी बैंक का पंजीकरण नहीं किया जाएगा जिसके संबंध में रिज़र्व बैंक द्वारा लिखित रुप में यह सूचित किया गया हो कि उसे लाइसेंस नहीं दिया जा सकता है। निबीप्रगानि की धारा 14 के अनुसार निगम द्वारा किसी बैंक को बीमाकृत बैंक के रूप में पंजीकरण करने के बाद उससे अपेक्षित है कि वह 30 दिनों के अंदर लिखित रूप में बैंक को सूचित करें कि उसे बीमाकृत बैंक के रुप में पंजीकृत किया गया है । सूचना पत्र में पंजीकरण सूचना और पंजीकरण संख्या के अलावा बैंक द्वारा पालन किए जाने वाले अपेक्षाओं के ब्यौरे, निगम को देय प्रीमियम दर, प्रीमियम भुगतान करने की पध्दति और निगम को प्रस्तुत किए जाने वाली विवरणियां आदि ब्यौरे शामिल होने चाहिए । बीमित बैंक को अपनी पहली विवरणी और प्रीमियम की राशि पत्र की प्राप्ति के एक महीने के अंदर प्रस्तुत करना चाहिए जिसे पंजीकृत डाक द्वारा या कारोबार के प्रारंभ से एक महीने के अंदर जो भी पहले हो प्रस्तुत करनी चाहिए । इसकी एक प्रतिलिपि भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ-साथ राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक/राज्य सहकारी बैंक और जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को परांकित किया जाता है।
बीमा कवरेज
प्रारंभ में निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 16(1) के मूल प्रावधानों के अंतर्गत बीमा सुरक्षा प्रति जमाकर्ता उसके द्वारा बैंक के सभी शाखाओं रखी गई जमाराशि को मिलाकर "समान अधिकार और क्षमता" में केवल 1500 रु.तक सीमित रखी गयी थी । तथापि, अधिनियम निगम को यह अधिकार देता है कि वह केंद्र सरकार के पूर्वानुमोदन से इस सीमा को बढ़ाए । तदनुसार, बीमा सीमा को समय-समय पर निम्नानुसार बढ़ाया गया है
1 जनवरी 1968 से 5000 रु.
1 अप्रैल 1970 से 10,000 र.
1 जनवरी 1976 से 20,000 रु.
1 जुलाई 1980 से 30,000 रु.
1 मई 1993 और उससे आगे 1,00,000 रु.
सुरक्षा प्रदत्त जमाराशियों के प्रकार
निबीप्रगानि निम्नलिखित जमाराशियों को छोड़कर बचत, मीयादी, चालू, आवर्ती आदि जैसे सभी बैंक जमाराशियों को बीमा प्रदान करता है ।
(i) विदेशी सरकारों की जमाराशियां;
(ii) केंद्र/राज्य सरकारों की जमाराशियां;
(iii) अंतर बैंक जमाराशियां;
(iv) राज्य सहकारी बैंकों में रखी गई राज्य भूमि विकास बैंकों की जमाराशियां;
(v) भारत के बाहर प्राप्त जमाराशि के कारण देय कोई राशि;
(vi) रिज़र्व बैंक के पूर्वानुमोदन से निगम द्वारा विशेष रूप से छूट प्राप्त
कोई राशि ।
बीमा प्रीमियम
प्रारंभ में प्रीमियम दर प्रति वर्ष प्रति 100 रु 5 पैसे (1 प्रतिशत का 1/20) निर्धारित किया गया । इसे 1 अक्तूबर 1971 से प्रति वर्ष प्रति 100 रु 4 पैसे( 1 प्रतिशत का 1/25) तक कम किया गया । तथापि, इसे पुनः बढ़ाकर 1 जुलाई 1993 से प्रति 100 रु 5 पैसे किया गया। चूंकि 2001 से निगम को कई विफल बैंको विशेषकर सहकारी क्षेत्र को देय बड़ी राशि के दावों का निपटान करना था जिससे जमा बीमा निधि (डीआइएफ) में काफी कमी आई । यद्यपि, वर्तमान में जमा बीमा निधि में पर्याप्त मूल निधि उपलब्ध है, यह आवश्यक है कि बैंकिंग प्रणाली के हितों की रक्षा करने के लिए दीर्घावधि में काफी अधिक मात्रा में जमा बीमा निधि का निर्माण करना होगा। इस उद्देश्य से निगम ने निर्णय लिया कि जमा बीमा प्रीमियम को दो वर्षों की अवधि में चरणबद्ध रूप से बढ़ाकर निर्धारणीय जमाराशियों का प्रति 100 रु. 10 पैसे किया जाए । पहले चरण में वित्तीय वर्ष 2004-05 में प्रीमियम बढ़ाकर निर्धारणीय जमाराशियों का प्रति 100 रु. 8 पैसे किया गया और बाद में वित्तीय वर्ष 2005-06 में निर्धारणीय जमाराशियों का प्रति 100 रु 10 पैसे किया गया । निगम निरंतर जमा बीमा निधि की समीक्षा करेगा और एक पर्याप्त जबीवि बनाये रखने के उद्देश्य से समय-समय पर प्रीमियम में संशोधन करने पर विचार करता रहेगा । अत: 8 पैसे का प्रीमियम अप्रैल और अक्तूबर 2004 से प्रारंभ होने वाले छमाहियों के देय होगा और 10 पैसे का प्रीमियम अप्रैल 2005 से प्रारंभ होने वाले छमाही के लिए देय होगा। निगम निरंतर जमा बीमा निधि की समीक्षा करेगा और एक पर्याप्त जबीवि बनाये रखने के उद्देश्य से समय-समय पर प्रीमियम में संशोधन करने पर विचार करता रहेगा । नया क्या है
निगम को बीमाकृत बैंकों द्वारा प्रदत्त प्रीमियम के संबंध में बैंकों से यह अपेक्षित है कि वे स्वयं इसका भार वहन करें न कि जमाकर्ताओं पर डालें ताकि जमा बीमा संरक्षण लाभ का हित जमाकर्ता को नि:शुल्क प्राप्त हो सके। अन्य शब्दों में प्रीमियम भुगतान के कारण होने वाला वित्तीय भार बैंक को वहन करना चाहिए और उसे जमाकर्ता पर अंतरित नहीं करना चाहिए। छमाही प्रीमियम परिकलित करने का फार्मूला निम्नानुसार है:-
जमाराशियों को हजार रुपए में पूर्णांकित किया गया *0.04/100
जमाराशियों को नजदीकी हजार रुपए में पूर्णांकित किया जाए।
ब्याज
एक बीमाकृत बैंक से अपेक्षित है कि वह प्रत्येक वर्ष मई और नवंबर के अंतिम दिन के बाद प्रीमियम विप्रेषित न करें । यदि वह निर्धारित समय के अंदर देय प्रीमियम या उसका अंश का भुगतान करने में हुए विलंब के लिए जैसी भी स्थिति हो, बैंक दर से 8% अधिक दर पर छमाही के प्रारंभ से भुगतान की तारीख तक ब्याज अदा करने के लिए बाध्य है। इस आधार पर ब्याज का परिकलन चूक के वास्तविक दिनों के लिए 1 वर्ष में 365 दिनों को लेते हुए किया जाता है।
प्रीमियम के अतिदेय राशि के संबंध में प्रीमियम या ब्याज के रूप में देय किसी भी राशि को निम्नलिखित पद्धति से भुगतान किया जा सकता है।
(i) भारिबैं, जमा लेखा विभाग, मुंबई के साथ रखे गए निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम निधि खाते में जमा किया जा सकता है।
(ii) रेखांकित चेक, डिमांड ड्राफ्ट या निगम के पक्ष में आहरित और देय टी.टी के माध्यम से विप्रेषण
पंजीकरण रद्द करना
निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 15 ए के अंतर्गत निगम को लगातार तीन छमाहियों के लिए प्रीमियम अदा न करने वाले बीमाकृत बैंकों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार है। तथापि, यदि संबंधित बैंक पंजीकरण हेतु अनुरोध करता है और चूक की तारीख से प्रीमियम के रूप में देय सारी राशि ब्याज सहित अदा कर देता है और निगम संतुष्ट हो तो बैंक के पंजीकरण को प्रत्यावर्तित कर सकता है ।
किसी बीमाकृत बैंक का पंजीकरण निम्न परिस्थितियों में रद्द किया जा सकता है- नयी जमाराशियां स्वीकार करने से उसे प्रतिबधित किया गया हो; अथवा रिज़र्व बैंक द्वारा इसका लाइसेंस रद्द किया गया हो अथवा नहीं दिया गया हो; अथवा उसका समापन स्वैच्छिक रूप से अथवा अनिवार्यतः किया गया हो अथवा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 36 (ए) के आशय में अब बैंकिंग कंपनी या सहकारी बैंक नही कहलाता हो; अथवा इसने अपनी सारी जमा देयताओं को किसी अन्य संस्था को अंतरित कर दिया हो; अथवा यह किसी अन्य बैंक के साथ समामेलित हो गया हो अथवा किसी समक्ष प्राधिकारी द्वारा कोई समझौता, व्यवस्था या पुनर्निर्माण स्कीम स्वीकृत किया हो और यह स्कीम नयी जमाराशियां स्वीकार करने की अनुमति न देती हो। किसी सहकारी बैंक के संबंध में इसका पंजीकरण भी रद्द हो सकता हे यदि यह पात्र सहकारी बैंक के रूप में कार्य करना बंद कर दिया हो । किसी बैंक के पंजीकरण रद्द करने की स्थिति में रद्द करने की तारीख तक बैंक की जमाराशियां को सुरक्षा प्रदान की जाएगी ।
विवरणियां
प्रत्येक बीमित बैंक से अपेक्षित है कि वह निगम को एक विवरण (फार्म डीआइ-01) जिसके आधार पर प्रीमियम उस बैंक द्वारा देय प्रीमियम परिकलित किया गया और उस छमाही के लिए उस बैंक द्वारा देय प्रीमियम की राशि दो प्रतियों में किसी भी स्थिति में छमाही के पहले माह के अंतिम दिन के बाद नहीं, प्रत्येक केलेण्डर वर्ष के प्रारंभ होने के बाद यथाशीघ्र प्रस्तुत करें। विवरण की यथार्थता इस प्रयोजन हेतु प्राधिकृत बैंक के दो अधिकारियों द्वारा प्रमाणीकृत होना चाहिए और विवरण और विवरणी पर हस्ताक्षर करने के लिए प्राधिकृत अधिकारियों के नमूना हस्ताक्षर निगम को निबीप्रगानि, 1961 के अंतर्गत प्रस्तुत करने चाहिए ।
इसके अलावा बीमित बैंकों से अपेक्षित है कि फार्म डीआइ-01 में छमाही विवरणी निगम को प्रस्तुत करें : एक फार्म डीआइ-02 में प्रति वर्ष जून के अंतिम दिन की स्थिति के अनुसार जमाकर्ताओं की मात्रा के अनुसार जमाराशियों के संवितरण दर्शाने वाला ।
किसी बैंक का परिसमापक जिसका कारोबार बंद कर दिया गया हो अथवा परिसमापित हो और अंतरिती बैंक या बीमित बैंक जैसी भी स्थिति हो, के सबंध में सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत समामेलन या पुनर्निमाण के मामले में कार्यपालक अधिकारी से अपेक्षित है कि निबीप्रगानि द्वारा जारी की गयी राशि की उपयोगिता के ब्यौरे, बैंक की आस्तियों की वसूली स्थिति और उस राशि की उपयोगिता तथा बैंक की आस्तियां और देयताएं सूचित करते हुए निर्धारित फार्मेट में तिमाही विवरण प्रस्तुत करें।
बीमाकृत बैंकों का पर्यवेक्षण और निरीक्षण
निगम को यह अधिकार दिया गया(निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 35) कि वे किसी बीमित बैंक के रिकार्डों को प्राप्त कर सके और ऎसे रिकार्डों की मांग कर सकते हैं। निगम के अनुरोध पर भारतीय रिजर्व बैंक से अपेक्षित है कि वह किसी बीमित बैंक का निरीक्षण/जाचं-पडताल करे।
किसी बीमाकृत बैंक के समापन या परिसमापन की स्थिति में पंजीकरण रद्द करने की तारीख (अर्थात् लाइसेंस रद्द करने अथवा समापन या परिसमापन की तारीख) तक बैंक के प्रत्येक जमाकर्ता द्वारा उसके सभी शाखाओं में रखी गई जमाराशियों को मिलाकर उसकी समान राशि समान अधिकार और क्षमता में ,यदि कोई राशि देय हो , के समंजन के अधीन भुगतान हेतु पात्र होंगे, ( निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 16(1) और (3) 1)। तथापि, प्रत्येक जमाकर्ता को भुगतान समय-समय पर निर्धारित बीमा सुरक्षा सीमा के अधीन किया जाएगा ।
जब किसी समक्ष प्राधिकारी द्वारा किसी बैंक के लिए समझौता या व्यवस्था या पुनर्निमाण या समामेलन स्कीम स्वीकृत की जाती है और इस स्कीम में जमाकर्ताओं को स्कीम के लागू होने की तारीख तक पूरी जमाराशि के क्रेडिट के लिए पात्र नहीं होते हैं तो निगम पूरी जमाराशि अथवा उस समय लागू बीमा कवर की सीमा में, जो भी कम हो, और स्कीम के अंतर्गत वास्तव में उसे प्राप्त राशि के बीच के अंतर की राशि अदा करता है । इन मामलों में भी, उस बैंक की सभी शाखाओं में समान अधिकार और क्षमता में जमाकर्ताओं की सभी जमाराशियों के संबंध में जमाकर्ताओं को देय राशि का निर्धारण बैंक को उनके द्वारा देय राशि यदि कोई हो, के समंजन के अधीन (निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 16 (2) और (3)) निर्धारण किया जाता है।
निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम की धारा 17(1) के प्रावधानों के अंतर्गत किसी बीमाकृत बैंक जिसका समापन हो चुका हो या परिसमापनाधीन है, के परिसमापक द्वारा निबीप्रगानि द्वारा यथानिर्दिष्ट पद्धति में प्रत्येक जमाकर्ता की जमाराशि और समंजन राशि को अलग-अलग दर्शाने वाली सूची तथा सूची की यथार्थता प्रमाणित करते हुए तीन महीनों के अंतर्गत निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम को प्रस्तुत की जानी है ।
ऐसे बैंक के संबंध में जिसके लिए समामेलन/पुनर्निमाण, आदि जैसी कोई स्कीम स्वीकृत है, इसी प्रकार की सूची संबंधित अंतरिती बैंक या बीमाकृत बैंक जैसी भी स्थिति हो के मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा समामेलन/पुनर्निमाण, आदि जैसी स्कीम के लागू होने की तारीख (निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 18(1) ) से तीन महीनों के अंदर प्रस्तुत की जानी है।
निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम से अपेक्षित है कि वह अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत प्रत्येक जमाकर्ता के संबंध में देय राशि का भुगतान ऐसी सूची के प्राप्त करने के दो महीनों के अंदर करे। तथापि, समय-सीमा निगम के अपेक्षानुसार सूचना/प्रलेखों के व्यवस्थित रहने के अधीन निर्धारित की जाएगी।
किसी बैंक के परिसमापन आदेश या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित समामेलन/पुर्ननिर्माण आदि की सूचना प्राप्त होने के बाद निगम परिसमापक/मुख्य कार्यपालक अधिकारी जैसी भी स्थिति हो को दावा सूची तैयार करने के संबंध में विस्तृत दिशा निर्देश जारी करेगा। इसके अलावा दावा सूची में दिए गए कुल जमाराशि की प्रामाणिकता का सत्यापन करने के लिए पंजीकरण रद्द करने की तारीख अर्थात् लाइसेंस रद्द करने/परिसमापन/समामेलन/पुर्ननिर्माण आदि की तारीख से बैंक के लेखा परीक्षित तुलन पत्र तथा लाभ और हानि लेखा मांगे जाएंगे। दावा सूची की संवीक्षा करते समय सामान्यत: पायी गयी असंगतियां संलग्नक में दी गयी हैं।
संलग्नक
निबीप्रगानि परिसमापक/अंतरिती /बीमित बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को जमाकर्ताओं को संवितरित करने हेतु पात्र राशि का भुगतान करता है। जमाकर्ताओं को सीधे कोई भुगतान नहीं करता है। तथापि, अनट्रेसबल जमाकताओं अर्थात् जिनके संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं है, को परिसमापक/मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा सभी अपेक्षित ब्यौरे प्रस्तुत करने तक रोक रखा जाता है।
निबीप्रगानि विनियमावली के विनियम 22 के साथ पठित निबीप्रगानि अधिनियम की धारा 21(2) के अनुसार परिसमापक अथवा बीमित बैंक अथवा अंतरिती बैंक जैसी भी स्थित हो, से अपेक्षित है कि वह विफल बैंकों के आस्तियों से वसूली गयी राशि में किए गए व्यय के लिए प्रावधानकरने के बाद प्रत्येक जमाकर्ता को रुपए में एक पैसा या अधिक भुगतान करने के लिए पर्याप्त राशि जमा होने के बाद निबीप्रगानि को राशि की चुकौती निधारित समय या पद्धति में करें।
लेखा
निगम निम्नलिखित निधियां रखता है :
(i) जमा बीमा निधि
(ii) ऋण गारंटी निधि
(iii) सामान्य निधि
पहले दो निधियों का निर्माण क्रमश: बीमा प्रीमियम और गारंटी शुल्क के संचयन से किया जाता है और संबंधित दावों के निपटान हेतु इसका उपयोग किया जाता है ।
सामान्य निधि का उपयोग निगम के स्थापना और प्रशासनिक व्यय को पूरा करने के लिए किया जाता है ।
सभी तीनों निधियों की अधिशेष राशि को केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है, जो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अनुमत एक मात्र निवेश है और ऐसे निवेशों से प्राप्त आय को संबंधित निधियों में जमा किया जाता है । अधिनियम के अंतर्गत अंतर-निधि अंतरण स्वीकार्य है और यदि किसी एक निधि में कमी हो तो अन्य दोनों निधियों में से किसी एक में से अंतरण करके उसे पूरा किया जाता है ।
निगम प्रति वर्ष जमा बा और ऋण गारंटी निधियों का के देयताओं का बीमांकिक मूल्यांकन प्रणाली 1987 से अपनाया। निगम 1988-89 से प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से आयकर के लिए पात्र हुआ।
प्रतिवर्ष 31 मार्च को निगम के बही खाते बंद किए जाते हैं । निगम के कार्यों की लेखा परीक्षा रिज़र्व बैंक के पूर्वानुमोदन से निदेशक बोर्ड द्वारा नियुक्त लेखा परीक्षकों द्वारा किया जाता है । लेखा परीक्षित लेखों के साथ लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट और निगम की कार्य पध्दति संबंधी रिपोर्ट लेखाबंदी के 3 महीनों के अंदर रिज़र्व बैंक को प्रस्तुत की जानी है । इन प्रलेखों की प्रतिलिपियां केंद्र सरकार को भेजी जाती है जिन्हें संसद के प्रत्येक सदन में रखी जाती है ।
निबीप्रगानि का प्रशासान विभाग सभी स्टाफ तथा सभी कर्मचारियों के संबंध में जो भारिबैं के कर्मचारी हैं , स्थापना संबंधी कार्यें को देखता है। निबीप्रगानि को एक स्वतंत्र रूप से वेतन आहरित करने वाला इकाई समझा जाता है।
बोर्ड अनुभाग बोर्ड बैठकें आयोजित करना, कार्यसूची नोट और बोर्ड बैठकों के कार्य विवरण तैयार करना और इन बैठकों मंं लिए गए निर्णयों की निगरानी तथा अनुपालन आदि से संबंधित कार्य करता है।
जमा बीमा में सुधार और नया कानून
वर्ष 1999 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने भारत में जमा बीमा की समीक्षा करने और वित्तीय क्षेत्र सुधारों के संबंध में परिवर्तन का सुझाव देने के लिए श्री जगदीश कपूर, उप गवर्नर, भरिबैं और निगम के अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक सलाहकार समूह के साथ-साथ एक कार्य दल भी गठित किया गया। सलाहकार समूह ने अक्तूबर 1999 में भारतीय रिज़र्व बैंक को अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया जिसमें निगम की संरचना, प्रबंधन और कार्यकलापों में कुछ प्रमुख परिवर्तन शामिल किए। चूंकि कुछेक सिफारिशों के संबंध में निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 में संशोधन अपेक्षित है, निगम ने भारतीय रिजंर्व बैंक के परामर्श से विद्यमान अधिनियमन के प्रतिस्थापन का सुझाव दिया। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुमोदन के बाद एक नया निक्षेप बीमा निगम बिल के रूपरेखा का प्रारूप भारत सरकार को प्रेषित किया गया।
प्रस्तावित जमा बीमा सुधारों के संबंध में वित्त मंत्री 2002-2003 के अपने बजट भाषण में घोषित किया कि निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम को बैक जमा बीमा निगम (बीडीआइसी) के रूप में परिवर्तित किया जाएगा जिससे इसे विपदग्रस्त किसानों के साथ लेन-देन के लिए एक प्रभावी साधन के रूप में तैयार किया जा सके और इस प्रयोजन हेतु उपयुक्त विधि परिवर्तन प्रस्ताव किए जाएंगे। भारत सरकार ने निर्णय लिया कि विधि परिवर्तन का प्रस्ताव करने से पहले एफडीआइसी मॉडल का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाएगा और भारत के लिए एक यथोचित मॉड्ल तैयार किया जाएगा। भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक के उच्च स्तरीय वरिष्ठ कार्यपालकों के एक टीम ने निबीप्रगानि के कार्य पद्धति का अध्ययन करने के लिए जून 1992 में इसका दौरा किया और एफडीआइसी और अन्य यूएस बैकिंग विनियामक और पर्यवेक्षी एजेंसियों के साथ विचार विमर्श किया। अध्ययन रिपोर्ट 14 जनवरी, 2003 को वित्त मंत्रालय, भारत सरकार को प्रस्तुत किया गया और " बैंक जमा बीमा निगम बिल, 2003(प्रस्तावित) की रूपरेखा" के संबंध में प्राप्त निदेश वित्त मंत्रालय, भारत सरकार को 28 फरवरी, 2003 को प्रेषित किया गया।
संलग्नक(Annexure)
निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम - जमा बीमा विभाग
परिसमापनाधीन/समामेलन/समझौता/व्यवस्था/पुनर्निर्माण योजना के अंतर्गत बैंकों से प्राप्त दावा सूची की संवीक्षा
बीमित बैंकों के जमा बीमा दावों को निबीप्रगानि अधिनियम 1961 की धारा 16(1 के साथ पठित धारा 17/18 के प्रावधानों के अनुसार निपटान किया जाना है। बैंकों से जमाकर्ताओं के संबंध में प्राप्त दावा सूची की संवीक्षा करते समय समान्यत: पाये जाने वाले असंगतियों को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित तथ्यों का सत्यापन/जांच करने की आवश्यकता थी।
(i) यह जांच करना कि दावा सूची में दर्शायी गयी कुल जमाराशियां तुलन पत्र में प्रस्तुत कुल जमाराशियों के साथ मेल खाती हैं। यदि कोई अंतर हो तो प्रलेखी साक्ष्य के साथ उसका उचित समाधान करना चाहिए।
(ii) क्रम संख्या, पृष्ठ संख्या की जांच करना ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्रम संख्या/पृष्ठ संख्या में आवर्तन न हो और कुछ छूट नहीं गया हो।
(iii) प्रत्येक पृष्ठ पर जोड़ की जांच करना और यह कि जोड़ सही ढ़ंग से अगले पृष्ठ पर लाया गया।
(iv) जमाकताओं के नामों की जांच करना ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एक ही जमाकर्ता के संबंध में समान अधिकार और समान क्षमता में दावे का आवर्तन नहीं हुआ हो यद्यपि जमाकर्ताओं के द्वारा नाम को विभिन्न तरीकों से उल्लेख करते हुए खाते खोले जाते है। (उदा: एस.के.सेन, समीर के.सेन, समीर कुमार सेन और एस.कुमार सेन)
(v) यह जांच करना कि यदि खाते किसी स्वामित्व/साझेदारी फर्म के नाम पर खोले गए खातों के मामले में उसे स्वामी द्वारा उसके व्यक्तिगत क्षमता/साझेदारी फर्म के वही साझेदारों के नाम पर संयुक्त खाते के नाम पर धारित खातों के साथ जोड़ दिया जाए।
(vi) यह जांच की जाए कि एक ही जमाकर्ता के नाम पर विभिन्न संयोजन/प्रकार से संयुक्त खातों के मामले में ऐसे खातों को एक साथ मिलाया जाए।
(vii) यह जांच करना कि एक ही खाता धारक द्वारा धारित विभिन्न प्रकार के खातों को एक साथ जोड़ दिया जाए।
(viii) यह जांच की जाए कि जमाकर्ता से बैंक को देय समंजन राशि/देयताओं के समायोजन के बाद परिकलित जमाराशियों के निवल राशि और जमाकर्ता से भुगतान यदि कोई प्राप्त हो, उसकी जांच करना।
(ix) यह जांच करना कि प्रत्येक जमाकर्ता के संबंध में समान अधिकार/समान क्षमता में दावा की गयी कुल राशि 1,00,000 रु की उच्चतम सीमा के अंदर है।