निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम
स्वर्ण जयंती वर्ष (2011)
निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम ने 1 जनवरी 2011 को अपने परिचालन के 50वें वर्ष में प्रवेश किया। 1 जनवरी 1962 को निगम अस्तित्व में आया। उस समय यह पूरे विश्व में दूसरा निक्षेप बीमा निगम था। पहला निक्षेप बीमा निगम संयुक्त राज्य अमेरिका में 1933 में स्थापित किया गया था। बैंकों के असफल होने के विभिन्न दृष्टांतों, जिन्होंने जमाकर्ताओं के विश्वास को बुरी तरह प्रभावित किया, के कारण निक्षेप बीमा की आवश्यकता महसूस हुई। तदुपरांत वित्तीय स्थिरता तथा लघु जमाकर्ताओं की सुरक्षा जैसे कारणों ने पूरे विश्व में निक्षेप बीमा का प्रचार-प्रसार किया, जिसे वर्ष 1980 में गति मिली।
बंगाल में बैंकिंग संकट उत्पन्न होने के उपरांत वर्ष 1948 में भारत में बैंक जमा राशियों का बीमा करने का विचार सामने आया। इसके एक वर्ष बाद यह मामला पुन: विचार हेतु प्रस्तुत हुआ। परंतु रिज़र्व बैंक द्वारा बैंकों के निरीक्षण की पर्याप्त व्यवस्था किए जाने तक इस मामले को रोके रखा गया। वर्ष 1950 में ग्रामीण बैंकिंग जाँच समिति ने इस धारणा का समर्थन किया। वर्ष 1960 में पलाइ सेंट्रल बैंक लि. तथा लक्ष्मी बैंक लि. के विफल होने के उपरांत रिज़र्व बैंक तथा केंद्र सरकार द्वारा जमाराशियों की बीमा के संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। 21 अगस्त 1961 को संसद में निक्षेप बीमा निगम(डीआईसी) बिल लाया गया। इसके पारित होने के उपरांत 7 दिसंबर 1961 को इस बिल को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई और निक्षेप बीमा अधिनियम 1961 दिनांक 1 जनवरी 1962 से प्रभावी हुआ।
अपनी स्थापना से लेकर निगम ने एक लंबी यात्रा तय की है। प्रारंभ में, निक्षेप बीमा सुरक्षा(कवर) वाणिज्यिक बैंकों को प्रदान किया गया। बाद में इसे सहकारी बैंकों तक बढ़ाया गया। चूँकि भारत में वाणिज्यिक बैंकों की असफलता के उदाहरण सीमित थे, अत: सहकारी बैंकों के जमाकर्ताओं को निक्षेप बीमा प्रणाली का सबसे अधिक फायदा हुआ। निगम, जिसे प्रारंभ में निक्षेप बीमा कवर उपलब्ध कराने का कार्य सौंपा गया था, को वर्ष 1978 में ऋण गारंटी उपलब्ध कराने का कार्य भी सौंप दिया गया ताकि वह अबतक के उपेक्षित क्षेत्रों की ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक बैंकों को प्रोत्साहित कर सके। तथापि बैंकों द्वारा योजना में अभिदान करना बंद कर दिए जाने के कारण ऋण गारंटी की योजनाएं अप्रचलित हो गईं।
भारत के बैंकिंग क्षेत्र ने हाल की वैश्विक वित्तीय समस्याओं का काफी हद तक सामना किया तथा उससे अप्रभावित भी रहा। तथापि, इस समस्या से हमने कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखा है। इस समस्या ने इस सोच को मजबूत किया है कि निक्षेप बीमा बैंकों की प्रणालीगत विफलता की स्थिति का सामना नहीं कर सकती बल्कि यह अपेक्षाकृत रूप से केवल छोटी वैयक्तिक विफलता का सामना कर सकती है। संकट के चलते जमाकर्ताओं का विश्वास बनाए रखने तथा बहाल करने के लिए केंद्रीय बैंकों तथा सरकारों द्वारा ऋण की व्यवस्था किया जाना महत्वपूर्ण हो गया। जमाकर्ताओं के दावों के वितरण में तेजी लाना एक महत्वपूर्ण अपेक्षा बन गई है। भारतीय संदर्भ में ये सभी मामले प्रासंगिक हैं।
स्वर्ण जयंती जैसा अवसर हमारे भीतर न केवल गर्व का अनुभव कराता है, बल्कि आत्म निरीक्षण करने का भी अवसर देता है। मैं इस अवसर पर ध्यान आकर्षित करने वाले कुछ प्रमुख मुद्दों पर विशेष रूप से प्रकाश डालना चाहता हूँ। निगम की निक्षेप बीमा निधि को मजबूत करना महत्वपूर्ण पूर्वापेक्षा है ताकि कई वर्षों से स्थिर कवरेज की सीमा को बढ़ाया जा सके। ऐसे में नैतिक जोखिमों जैसे अन्य विचारों पर भी निश्चित रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। निगम भी जमाकर्ताओं को प्रतिपूर्ति करने में तेजी लाने के उपाय तलाश रहा है। इस हेतु तकनीकी उन्नयन तथा जमाकर्ताओं का कंप्यूटरीकृत डेटाबेस विकसित करने में निगम और बैंकों के मध्य प्रभावी इंटरफेस तैयार किया जाना अपेक्षित है। बैंक के संकल्प से संबंधित विभिन्न पक्षों में भागीदारी कर सकने के लिए निगम के मैंडेट को विस्तृत करना एक अन्य चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है। इस संदर्भ में मैं इंटरनेशनल एसोसिएशन आफ डिपाजिट इंश्योरेस द्वारा विकसित प्रभावी निक्षेप बीमा प्रणाली संबधी प्रमुख सिद्धांतों का उल्लेख करना चाहता हूँ। इन सिद्धांतों का अनुपालन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हमारा यह प्रयास होगा कि हम इसमें उपयुक्त सुधार लाएं।
निगम का स्वर्ण जयंती वर्ष प्रारंभ होने के इस अवसर पर मैं इस बात पर पुन: जोर देना चाहता हूँ कि हम बैँक जमाकर्ताओं को सुरक्षा नेट उपलब्ध कराने तथा बैंकिंग प्रणाली में जनता का विश्वास अर्जित करके वित्तीय स्थिरता में सहयोग देने की अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखें।